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Tuesday, 13 August 2013

"चाहतों का दर्द तो सीने में दफ्न है"

आँखों को आँसुओं का खजाना बना लिया 

खामोशियों को दिल का ठिकाना बना लिया 


चाहतों का दर्द तो सीने में दफ्न है

पीने का हमने खूब बहाना बना लिया


अपनी तो हो गयी है हर शाम उसके नाम

यादे वफा की हमने फसाना बना लिया 


नजरें मिली तो हमको नजारे न मिल सके

उसकी नजर ने हमको निशाना बना लिया


वो जानते नहीं कि राख में भी आग है

घायलने प्यार को ही तराना बना लिया

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल बृहस्पतिवार (15-08-2013) को "जाग उठो हिन्दुस्तानी" (चर्चा मंच-अंकः1238) पर भी होगा!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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